Friday, 22 December 2017

आदिवासी जन नायक बिरसा मुंडा,क्या आप जानते है इनके बारे में


बिरसा मुंडा या फिर भगवान बिरसा मुंडा जिस नाम से उन्हें हमारा देश जानता है लेकिन अधिकांश लोगों को आज भी उनके बारे में पता नही है। अगर आप भी नही जानते उनके बारे में तो चलिए आपको बताते है। बिरसा मुंडा 19वीं सदी के एक प्रमुख आदिवासी जननायक थे। उनका जन्म 15 नवम्बर 1875 को बिहार प्रदेश के उलीहातू गांव जिला रांची में हुआ था। उस वक़्त बिहार और झारखंड एक ही राज्य थे और बंगाल का विभाजन भी नही हुआ था। साल्गा गांव में पढ़ाई के बाद वे चाईबासा इंग्लिश मिडिल स्कूल में पढ़ने गए। यहां उन्होंने ईसाई धर्म को नज़दीक से देखा ओर महसूस किया। वहाँ पर पढ़ाई के दौरान वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि आदिवासी समाज मिशनरियों से तो भ्रमित है ही लेकिन हिन्दू धर्म को भी सही ढंग से नहीं समझ पा रहा है। यही से बिरसा मुंडा के मन मे समाज के उत्थान की लहरें उठनी शुरू हो गयी।

अंग्रेजों के भारत आने से पहले जल-जंगल और ज़मीन आदिवासियों के लिए मां की तरह हुआ करते थे। भारत में अंग्रेजों के आगमन और उनके द्वारा भारत के शासन-प्रसाशन में सक्रिय और गैरज़रूरी दखल की वजह से आदिवासियों को ही उनके प्राथमिक अधिकारों से वंचित कर दिया गया। ब्रितानी हुकूमत ने आदिवासियों से उनके प्राकृतिक अधिकार छीन लिए।आदिवासी जो पहले से ही वहां की सामंती और जमींदारी व्यवस्था से लड़ते आ रहे थे उसे बिरसा मुंडा ने और धार देने का काम किया।

अंग्रेजो से संघर्ष और उलगुलान आंदोलन की शुरुआत।

बिरसा मुंडा के संघर्षों और जिजीविषा की वजह से वहां के स्थानीय उन्हें 'धरती बाबा' के नाम से पुकारते थे। बिरसा मुंडा ने उस सबके खिलाफ मोर्चा खोल दिया जिन्होंने उनसे उनके ही संसाधनों को छीन कर उन्हें गुलामों के मानिंद जीने को विवश किया। इसी लूट से लड़ने के लिए बिरसा मुंडा ने आदिवासी समाज के बीच उलगुलान के बीज डाले थे। उलगुलान का शाब्दिक अर्थ 'भारी कोलाहल व उथल-पुथल' होता है। उलगुलान सृजन के लिए उलगुलान शोषण के खिलाफ़, उलगुलान अपने हक़ों के लिए, उलगुलान झूठ और फरेब के खिलाफ़, उलगुलान ब्रितानी और सामंती व्यवस्था के खिलाफ़ उलगुलान लोकसत्ता को स्थापित करने हेतु। वे यह जानते थे कि आदिवासियों से उनके संसाधन की लूट के खिलाफ़ उलगुलान ही उनका हथियार व जवाब होगा।
बेहद संसाधनविहीन होने के बावजूद वे और उनके द्वारा गठित गोरिल्ला सेना अंग्रेजों से न सिर्फ़ लड़ती रही बल्कि उन्होंने कई जंगें भी जीतीं। उनकी सेना अंग्रेजों की तोपों और बंदूकों के खिलाफ़ विषबुझे तीरों से अनवरत लड़़ती-कटती रही अन्त में चक्रधरपुर में बिरसा की भी गिरफ़्तारी हो गई। गिरफ़्तारी के वक़्त उनकी उम्र महज 25 वर्ष थी। ऐसा माना जाता है कि अंग्रेजों ने उनके प्रभाव को देखते हुए कारागार में उनको मीठा ज़हर दे दिया और कहा कि कारागार में हैजे की वजह से उनकी मौत हो गई। हालांकि उनका यह तर्क किसी के गले नहीं उतरा और इस तरह भारत माता का यह सच्चा सबूत शहीद होकर इतिहास में अमर हो गया।
बिरसा मुंडा हमारी साँझी विरासत का नाम है। हमारे देश के संसद के सेंट्रल हॉल में भी उनका चित्र टांगा गया है वही उनके नाम पर रांची के डिस्टिलरी पुल के पास समाधि भी स्थापित की गई है ओर उनकी मूर्ति भी लगी है। सरकार ने उनकी स्मृति में रांची के केन्द्रीय कारागार और साथ ही रांची हवाई अड्डे का नाम बदल कर बिरसा मुंडा हवाई अड्डा कर दिया गया है। बिरसा मुंडा को सभी देशवासियों की तरफ से शत शत नमन।

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